आलीराजपुर ज़िले में सरकार की भूमि अधिग्रहण नीतियों के खिलाफ़ आदिवासी क्षेत्रों में बड़ा जनविरोध उभरने लगा है।
अलीराजपुर, जोबट, कुक्षी और गंधवानी विधानसभा क्षेत्रों के प्रतिनिधि, सरपंच और कांग्रेस कार्यकर्ता अब एक मंच पर आकर “जल, जंगल और ज़मीन बचाओ आंदोलन” को नई दिशा देने की तैयारी में हैं।
इसी कड़ी में पटेल फार्म हाउस, बोरखड़ में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें आगामी 12 नवंबर को ग्राम डावड़ी (जोबट–कुक्षी–गंधवानी सीमा क्षेत्र) में एक विशाल जनआंदोलन करने का निर्णय लिया गया।
⚡ नेताओं की मौजूदगी और आंदोलन की रूपरेखा
बैठक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मंत्री व कुक्षी विधायक सुरेंद्र सिंह बघेल (हनी) सहित कई आदिवासी जनप्रतिनिधि और कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल हुए।
बैठक की अध्यक्षता आदिवासी विकास परिषद के प्रदेश उपाध्यक्ष महेश पटेल ने की, जबकि जोबट विधायक श्रीमती सेना महेश पटेल ने आंदोलन की रूपरेखा तय की।
नेताओं ने साफ कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के लिए है।
🎙️ बैठक में गूँजे तीखे तेवर
🔸 महेश पटेल (प्रदेश उपाध्यक्ष, आदिवासी विकास परिषद) ने कहा —
“आदिवासियों की ज़मीन सिर्फ़ उनकी रोज़ी-रोटी नहीं, उनकी पहचान है।
सरकार निजी कंपनियों के दबाव में ज़मीनें छीनने की साज़िश कर रही है —
हम यह अन्याय बर्दाश्त नहीं करेंगे।
यह लड़ाई जल, जंगल और ज़मीन की है, और इसे आख़िरी साँस तक लड़ेंगे।”
उनका बयान आंदोलन की दिशा और दृढ़ता दोनों को स्पष्ट करता है।
🔸 सेना महेश पटेल (विधायक, जोबट) ने कहा —
“अब आदिवासी समाज की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती।
जब हमारी माताएँ, बहनें और युवा सड़क पर उतरेंगे, तब सरकार को जवाब देना ही पड़ेगा।
यह आंदोलन हक़ माँगने का नहीं, अपने अधिकार बचाने का संघर्ष है।”
उन्होंने कहा कि सरकार ने आदिवासी क्षेत्रों को “विकास” के नाम पर उजाड़ने की नीति अपनाई है, जिसे अब जनता जवाब देगी।
🔸 अर्जुन बघेल (युवा नेता, कुक्षी) ने भी सरकार पर सीधा निशाना साधते हुए कहा —
“यह नीति पूरी तरह जनविरोधी और आदिवासी विरोधी है।
युवाओं ने ठान लिया है कि जो हमारी ज़मीन पर डाका डालेगा,
उसे लोकतांत्रिक तरीके से जवाब दिया जाएगा।”
🧾 संकल्प और संदेश
बैठक के अंत में उपस्थित प्रतिनिधियों ने एक स्वर में “आदिवासी संकल्प घोषणा” दोहराई —
“हम अपनी जल, जंगल और ज़मीन की रक्षा के लिए सड़क पर उतरेंगे,
चाहे इसकी कितनी भी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।”
यह संकल्प सभा देर शाम तक चली और इसमें सैकड़ों सरपंच, जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता मौजूद रहे।
🔍 आंदोलन का पृष्ठभूमि और प्रभाव
सूत्रों के अनुसार, प्रदेश सरकार द्वारा हाल में प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण और औद्योगिक निवेश नीति के तहत कई आदिवासी क्षेत्रों की ज़मीन निजी परियोजनाओं को दी जा सकती है।
इससे स्थानीय समाज में भारी असंतोष है।
कांग्रेस ने इस मुद्दे को आदिवासी अस्मिता बनाम सरकारी नीतियों के रूप में उठाने की रणनीति बनाई है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 12 नवंबर को होने वाला डावड़ी का यह कार्यक्रम
प्रदेश में आदिवासी राजनीति की नई दिशा तय कर सकता है।


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